Thursday, December 8, 2022

Ravish Kumar Prime Time: The Person Who Gave 20 Thousand Should Be Traced, The Person Who Gave 20 Crore Should Be Hidden – रवीश कुमार का प्राइम टाइम : 20 हज़ार देने वाले का पता लगे, 20 करोड़ देने वाला छुप जाये


पारदर्शिता की नई परिभाषा अगर आपको समझनी है तो 2017 में पास इलेक्टोरल बॉन्ड के कानून से समझ सकते हैं. इस कानून के पास होने के बाद आप कभी नहीं जान सकते कि किस एक दल को कई सौ या कई हजार करोड रुपए का चंदा कौन सी कंपनी या कोई व्यक्ति दे रहा है, लेकिन चुनाव आयोग इस बात को लेकर चिंतित है कि नकद के रूप में बीस हजार रुपए तक का जो चंदा दिया जाता है उसमें पारदर्शिता नहीं है. मतलब बीस हजार कैश कौन दे रहा है? पता चले तो इस तरह से यह क्यों नहीं पता चले कि किसी एक दल को दस करोड़ या सौ करोड़ रुपए का चंदा कौन दे रहा है. अगर पारदर्शिता इतनी जरूरी है तब तो चुनाव आयोग को ये लिखना चाहिए. इलेक्टोरल बॉड खरीदने वाले का नाम पता चलना चाहिए. इससे पारदर्शिता आती है. क्या किसी भी कानून को आप पारदर्शी कह सकते हैं जिसके कारण करोडों रुपए का चंदा देने वाले का नाम ही पता ना चले. यह दौर गोदी मीडिया का है.

सूचनाओं और सवालों पर खास तरह के नियंत्रण का झूठ फेक न्यूज से आगे जा चुका है. सूचनाओं के प्रसार के बहुत सारे माध्यम आपकी जेब में है. फोन में है मगर सूचनाएं नहीं. सवाल करने के लिए नागरिकों को सूचनाएं चाहिए और वो वहीं सूचनाओं को आपने मुंह खबर भी कहते हैं. इनके नाम पर कवर हो रहे हैं. उदाहरण के लिए आप कर्तव्य पथ के कवरेज और चीता के कवरेज से इसे समझ सकते हैं. चीता के कवरेज के नाम पर आपने ज्यादातर प्रधानमंत्री को देखा होगा. ऐसे माहौल में चीता बचते हैं या नहीं या सही भी है या नहीं? इस तरह के सवालों और जानकारियों से लैस कोई बहस या रिपोर्ट अपने कम देखी होगी. तो इस तरह से आप देख तो रहे हैं मगर जान कुछ नहीं रहे. सूचना की जगह छवि बैठाई जा रही. आप छवि को ही काम मान लेते हैं, परिणाम मान लेते हैं. सूचना तंत्र का उपभोग करने वाली आबादी का एक बड़ा हिस्सा. अब ऐसा ही हो चुका है. आंखें हैं मगर धंसी हुई हैं, गाल पिचक गए हैं. कपार सिकुड़ गया है. इन चेहरों के भीतर इतनी ही चेतना बची हुई है. वोटिंग मशीन पर उंगलियां दब जाती हैं. टेक्नोलॉजी ने कई तरह के माध्यम तो दे दिए. टीवी नहीं तो यूटूब यूटूब नहीं तो इंस्टा इंस्टा नहीं तो ट्विटर नहीं तो फेसबुक मगर सूचनाएं कहाँ सूचनाओं पर इतना सख्त पहरा है कि सवाल कर देने भर से रिपोर्टर की नौकरी चली जाती है और अब तो सवाल करने वाले रिपोर्टर ही नौकरी पर नहीं रखे जाते हैं. कहीं भी नई सूचना नहीं है.

नए सवाल नहीं है प्रचार ही सूचना स्क्रीन पर जो मानव चेहरे हैं नारियल के उस फल की तरह जो पेड़ से गिरने के बाद जडों के आसपास पड़े-पड़े सड़ते गलते नजर आने लग जाते हैं. जब बॉड का कानून पास हुआ तब जनता ने स्वाभाविक सा लगने वाला ये सवाल क्यों नहीं किया की दो सौ करोड़ का बॉड कौन कंपनी कौन आदमी खरीद रहा है. उसके नाम पर कानून बनाकर पर्दा डाल दिया गया है. तब यह कानून पारदर्शी कैसे हो सकता है?  जब जनता ये सवाल पूछने के लायक नहीं बची तब वो इस प्रस्ताव के खतरों या खूबियों को कैसे समझ सकेगी जिसे चुनाव आयोग ने कानून मंत्री के पास भेजा है. भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने केंद्रीय कानून मंत्री को पत्र लिखा है कि अज्ञात रूप से कोई दो हजार से अधिक कॅश चंदा दे तो उस पर रोक लगनी इस वक्त बीस हजार रुपए तक नकद चंदा दिया जा सकता है. सूत्रों के हवाले से ये खबर मीडिया में कई जगहों पर छपी है. इसके लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ने सरकार को सुझाव दिया है कि चुनावी चंदे में काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन किए जाए. हाल ही में चुनाव आयोग ने दो सौ चौरासी गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई की है. इनमें से ढाई सौ से अधिक दल सक्रिय भी न इनमें से कईयों पर कर चोरी के आरोप हैं. आयोग ने अपनी जांच में पाया कि कई दलों ने चंदे की रिपोर्ट में जीरो दिखाया लेकिन उनके खातों की ऑडिट करने पर पता चला कि चंदा लिया गया था.

आयोग का ये भी सुझाव है कि किसी भी दल को बीस करोड़ से ज्यादा नगद चंदा ना मिले या जितना भी चंदा मिलता है उसका बीस प्रतिशत ही नगद चंदा मिले. तमाम मीडिया रिपोर्ट में इस बात की जानकारी नहीं है कि जो बड़े राजनीतिक दल हैं, जो सरकारें बनाते हैं, जो विपक्ष में होते हैं उन दलों में कितना कैश चंदा मिलता है. उन दलों ने कितनी गड़बड़ियां की. यह भी सुझाव है कि चुनाव में उम्मीदवार दो हजार से ऊपर का जितना भी खर्चा करेगा या तो चेक से करेगा या डिजिटल पेमेंट से करेगा. इसके लिए खाते खोलने होंगे अलग से और सारा खर्चा इसी खाते से होगा. उम्मीदवार विदेशी चंदा नहीं ले सकेगा,  नगर चन्दा देने के खतरे हैं, लेकिन अब इसके सामने एक नया खतरा खड़ा हो गया है जो उस से भी बड़ा है. इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. कई महीनों के इंतजार के बाद खबरें आ रही हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस मसले को जल्दी सुन सकता है. हमें देखना चाहिए कि इलेक्टरल बांध के आने के बाद नगद चंदा की सीमा तय करने से कौन सा हम बड़ा लक्ष्य हासिल करना ना चाहते हैं. हालत ऐसी हो गई है कि जैसे ही डिजिटल पेमेंट का जिक्र आता है,  मान लिया जाता है कि सब कुछ पारदर्शी हो जाएगा. दो हजार सत्रह में इलेक्टोरल बॉन्ड के कानून पास हुआ इस साल वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में कहा कि चंदा देने वाला या अन्य पारदर्शी तरीके से चंदा देने से डरता है घबराता है क्योंकि उसे लगता है कि उसकी पहचान उजागर हो जाएगी. सरकार परेशान करेगी क्योंकि चेक से कोई चंदा नहीं देना चाहता था. इसलिए तत्कालीन वित्त मंत्री ने बॉड का प्रस्ताव किया. मतलब आप बॉड खरीद लें, आपका नाम किसी को पता नहीं चलेगा. जब करोडों रुपए के बॉड खरीदने वालों के नाम छुपाए जा रहे हैं तब दो हजार रुपए चंदा देने वाले आम लोगों के नाम क्यों बताए जाने चाहिए.

यही नहीं जिस खबर को सूत्रों के हवाले से छापा गया है कि एक आदमी या एक सौ से दो हजार रुपए ही कॅश में चंदा दिया जा सकता है, लिया जा सकता है या तो दो हजार सत्रह में भी. संसद में अरुण जेटली ने कहा था कि चुनाव आयोग ने सुझाव दिया है कि किसी राजनीतिक दल को कैश में दो हजार से ज्यादा चंदा नहीं दिया जा सकेगा. उस साल योगेंद्र यादव ने हिंदू में लिखा कि वित्तमंत्री अपने भाषण में दावा करते हैं कि चुनाव आयोग के सुझाव का पालन कर रहे हैं लेकिन बॉड बिल में कुछ और है. बिल में बीस हजार तक कैश चंदा देने की सीमा को नहीं बदला गया है. मंत्री ने केवल प्रस्ताव भर क्या है फैसला नहीं स्क्रोल में असोसीएशन फॅार्म के जगदीप छोकर का बयान छपा था कि इससे खास फायदा नहीं होगा. अब राजनीतिक दल उन्नीस सौ निन्यानवे रुपए का चंदा दिखाने लग जाएँगे. उन्होंने कहा कि जहां तक राजनीतिक दलों के चंदे के सोर्स का सवाल है, सत्तर प्रतिशत चंदे के सोर्स का पता ही नहीं चलता, अनाम रह जाता है. देखिए ये भेदभाव तो है ही. जो काम चंदा देगा उसको नाम पता बताना पड़ेगा और जो ज्यादा चंदा देगा उसको नाम पता नहीं बताना पड़ेगा. ये तो सीधा-सीधा भेदभाव है और इसकी वजह यही है कि जो लोग ज्यादा करोड़ों में चंदा देते हैं उनके लिए सरकार सहानुभूतिपूर्ण होती है और जो लोग कम चंदा देते हैं उनको देते रहते है उसका तो कोई ज्यादा फायदा होता नहीं है. एक एक हजार अगर कोई देगा तो कितने हजार देना पड़ेगा की कोई आदमी सीधे सीधे एक करोड़ दे देगा. दस करोड़ दे देगा. दो सौ करोड़ दे देगा ये काम चंदा देने वाले और ज्यादा चंदा देने वाले में भेदभाव बिलकुल है.

इसका असर यही है कि राजनीतिक दल छोटे चंदे देने वालों की तरफ ज्यादा गौर नहीं करते हैं. वो सिर्फ बडा चंदा देने वालों की तलाश में रहते हैं कि जो ज्यादा चंदा दे दे एक ही दफा में तो फिर और उसे नहीं मांगना छोटी पार्टियां ये वो है जो चुनाव हैं उन को इसका नुकसान जरूर होगा क्योंकि उनको बडा चंदा देने वाले शायद ज्यादा गौर नहीं करेंगे. ये जो अभी अभी जो आजकल की सूचना है कि उनके चुनाव अधिकारी ने चिट्ठी लिखी है लॉ मिनिस्ट्री को उससे तो कोई फायदा होने वाला नहीं है क्योंकि उसमें सबसे फंडा ऍम पॉइंट है कि लोग डोनेट करेंगे. पॉलिटिकल पार्टियों को उनको डिक्लेयर करेंगे तो अगर किसी को डिक्लेअर करना होगा तो वो कैश देगा ही क्यों? और अगर कोई आदमी कहेगा कि मैंने पॉलिटिकल पार्टी को दो सौ करोड़ रुपया दिया उसमें से बीस करोड़ कैश में दिया और एक सौ अस्सी करोड़ मैंने चेक भी दिया तो पहले तो उससे ये पूछा जाएगा कि तुम्हारे पास बीस करोड़ कैश में कहां से आया वो उसका क्या जवाब देगा. ये जो अभी ये चिट्ठी का तो कोई ज्यादा असर नहीं होने वाला है वो बीस हजार दो हजार किया गया है. ये पहले भी हो चुका है और फर्क सिर्फ इतना है कि दो लोग पहले उन्नीस हजार नौ सौ निन्यानवे रुपये की रसीद काटते थे.

अब वो एक हजार नौ सौ निन्यानवे रुपए की रसीद काटते कर देंगे और अब इससे जमीन पर कुछ नहीं पड़ेगा. नियम तो ऐसा हो कि चाहे बाँड खरीदने वाला हो या चेक से देने वाला हो या नकद देने वाला हो, सबका हिसाब पारदर्शी तरीके से जनता के बीच मौजूद हो. किसी कंपनी पर रोक नहीं है कि वो एक करोड़ से ज्यादा चंदा नहीं दे सकती. फिर आम लोगों पर कैसे पाबंदी लग सकती है कि वो दो हजार से ज्यादा नकद में चंदा नहीं दे सकता. क्या हम इस तरीके से किसी दल को बड़ी कंपनियों के चंदे पर निर्भर नहीं बना रहे? एक सवाल ये भी है कि ऐसा कर कहीं हम किसी नई राजनीतिक पार्टी के बनने की संभावना को भी तो नहीं करते रहे? उदाहरण के लिए जब कांशीराम अपनी विचारधारा को लेकर चल रहे थे तब अक्सर कहा करते थे की कंपनी वाले लोग बड़े पूंजीपति उनकी पार्टी को चंदा नहीं देते हैं इसलिए आम लोगों से कैश में चंदा लेते हैं. अगर ऐसा कानून तब होता कोई राजनीतिक दल बीस करोड़ से ज्यादा कैश इसमें चंदा नहीं ले सकता है. तब क्या बसपा जैसी कोई पार्टी होती? क्या तब इस पार्टी के कारण देश को स्वतंत्र रूप से दलित मुख्यमंत्री मिलती. अक्सर जब कोई नई विचारधारा जन्म लेती है तो आम लोग अपनी जेब से चंदा देकर उस पार्टी को वर्षों तक चलाते हैं. हमारा सवाल साफ है कितने करोड़ का बौंड खरीदे उस पर कोई सीमा नहीं तो कितना चंदा कॅश में देंगे. उस पर सीमा कैसे हो. वैसे भी बीस हजार से ऊपर जो कैश देते हैं उनका पैन नंबर बताना होता है तब इसे घटाकर दो हजार क्यों किया जा रहा है?  इससे तो ज्यादा से ज्यादा आम लोगों की पहचान उजागर हो जाएगी.

एक तरीके से विपक्ष के ऊपर छोटी पार्टियों के ऊपर जिन जिन पार्टी का फंडिंग जो क्राउड फंडिंग होता है,  जैसे हमारी पार्टी हमारी पार्टी क्राउडफंडिंग होता है, गरीब लोग हैं, मजदूर लोग हैं, जो सौ सौ दो, दो सौ पांच पांच सौ हजार दो हजार रुपए का चिंता देते हैं, वो कहाँ से फॅर? क्या हमारी पार्टी का बेस बॉड वाला है और हमारी पार्टी वैसे भी कॉरपरेट फंडिंग लेती नहीं तो सबसे पहले रिफॉर्म होना चाहिए. जो ट्रल बोर्ड है वो होना चाहिए क्यों? क्योंकि ये किसी जो हमने पीछे हट देखा है. मोर कॅाल बाउंड एक ही पार्टी को जा रहे हैं. सरकारी पार्टी को जा रहे हैं और आज की डेट में किसी की हिम्मत नहीं है किसी कॉरपरेट हां उसकी की वो विपक्ष को पैसा दे दे क्योंकि ऍम अगर बड़े राजनीतिक दल अपनी तरफ से गलत जानकारी देते हैं तब कार्यवाही क्यों नहीं होती जिस तरह से छोटे और गैर मान्यता प्राप्त दलों के खिलाफ कार्रवाई हो जाती है. एसोसिएशन फॅार्म के जगदीप छोकर ने द वायर में लिखा है कि दो हजार चौदह में दिल्ली हाइकोर्ट ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को इस बात के लिए दोषी पाया कि विदेशी चंदे से संबंधित ऍफ सी कानून का उल्लंघन किया गया है और छह महीने के भीतर इन दोनों दलों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए मगर कार्यवाही नहीं हुई. उल्टा बॅास से इस कानून में बदलाव कर दिया गया. कई खबरें मिल जायेंगी, जिससे पता चलता है कि सरकार बनाने वाली और सरकार में हिस्सा लेने वाली पार्टियां अपने चंदे का हिसाब सही तरीके से नहीं देती हैं. समय से भी नहीं देती है और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती है. बिजनेस स्टैंडर्ड की खबर को देखिए दिसंबर दो हजार चौदह की है. इसमें कहा गया है कि एनसीपी और सीपीआई ने बताया है कि उनकी पार्टी को केवल पंद्रह और चवालीस लोगों ने ही बीस हजार से अधिक का चंदा दिया. इसी रिपोर्ट में है कि बीजेपी अकेली राष्ट्रीय पार्टी है जिसने दो हजार तेरह चौदह में बीस हजार से अधिक का चंदा देने वालों की सालाना रिपोर्ट चुनाव आयोग को न नहीं दी. रिपोर्ट है कि बहुजन समाज पार्टी ने कह दिया कि उसे बीस हजार से अधिक का किसी ने चंदा ही नहीं दिया. बिजनेस स्टैंडर्ड की ये रिपोर्ट दो हजार चौदह की है जिससे पता चलता है कि बड़े राजनीतिक दल भी चंदा देने वालों के बारे में कितनी सही जानकारी देते हैं.

मगर इनके खिलाफ उस तरह की कार्यवाही नहीं होती जिस तरह से गैरमान्यताप्राप्त ढाई सौ दलों के खिलाफ कार्रवाई हो गई. राजनीतिक दल इस समय डिजिटल पेमेंट कैश के रूप में चंदा ले सकते हैं. इस चंदे में अल ऍम अल बौंड का हिस्सा बहुत बडा हो चुका है. इस सवाल को देखना चाहिए. एक समय नियम था कि कोई कंपनी अपने मुनाफे का केवल साढे सात प्रतिशत तक ही किसी दल को चंदा दे सकती है और जिसे चंदा दी क्या जाएगा उसका हिसाब कंपनी अपने खाते में दर्ज करेगी. सरकार ने इस नियम को बदल दिया. साढ़े सात प्रतिशत की सीमा समाप्त कर दी गई और यह प्रावधान भी हटा दिया गया, जिसके तहत किसी कंपनी को बताना पड़ता था कि किस दल को कितना चंदा दिया गया है. यहाँ याद करने की जरूरत है की ऍम अल बौंड का कानून आया कैसे उस समय की आपत्तियों को कैसे नजर अंदाज किया गया. इस संदर्भ में हम सत्ताईस नवंबर दो हजार उन्नीस के प्राइम टाइम का एक हिस्सा दिखाना चाहते हैं. न्यूज लॉन्ड्री पर हिंदी में नितिन सेठी की छह रिपोर्ट छपी थी. उस साल अंग्रेजी में हफपोस्ट पर छपी थी. प्राइम टाइम के उस पुराने हिस्से को हम इसलिए दिखा रहे हैं ताकि पता चले कि इलेक्टरल बॉन्ड को लाने के लिए कौन से तरीके अपनाए गए, किन बातों को छोड़ दिया गया. नितिन सेठी की पहली रिपोर्ट खतरनाक लगती है. अल ऍम अल बाँड के लिए शुरू में जो कंसेप्ट नोट बना, वित्त मंत्रालय के भीतर वो किसी अधिकारी के लेटर पैड पर नहीं था. आधिकारिक कागज पर नहीं था बल्कि सारे कागज था. ना तो सादे कागज पर तारीख थी और ना ही किसी का दस्तखत.

पूर्व अधिकारियों ने इस कागज को देखकर बताया है कि बाहर से किस किसी ने लिखा है. ऐसा लगता है और इस की भाषा अधिकारियों की भी नहीं लगती है. एक फरवरी दो हजार सत्रह को अरुण जेटली बजट पेश करने वाले थे. उसके चार दिन पहले रिजर्व बैंक से राय मांगी जाती है. सोचिए तब के राजस्व सचिव हसमुख अधिया के जवाब के अनुसार तब तक वित्त विधेयक की काँपी छप चुकी थी. तब राय क्यों मांगी गई. भाई फिर फिर भी रिअल बॅाल बौंड को लेकर कई आपत्तियां दर्ज कराता है जिसे नजर अंदाज कर दिया जाता है. रिजर्व बैंक की आपत्ति गोपनीयता को लेकर थी तो जवाब मिला कि दान देने की गोपनीयता. इसका उद्देश्य देने वाले का पता ना चले ये मकसद बजट पेश करने से चार दिन पहले एक सीनियर टैक्स अफसर को कुछ गड़बड़ियां नजर आती हैं. यही कॅाल बौंड से बड़े कॉर्पोरेशन अपनी पहचान छिपाते हुए अस्मित धान, धान राजनीतिक दलों को दे सकते हैं. यह तभी संभव हो सकता है जब भारतीय रिजर्व बैंक के अधिनियम में बदलाव किया जाए. उसी दिन वित्त मंत्रालय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर को ईमेल भेजकर त्वरित टिप्पणी मांगता है. सोचिए तीस जनवरी दो हजार सत्रह को रिजर्व बैंक कहता है कि उसके अधिनियम में संशोधन से गलत परंपरा की शुरुआत होगी. मनीलॉन्डरिंग इस इस बौंड से बढ़ जाएगी पैसा किसी तीसरी पार्टी का होगा और खरीदने वाला कोई और होगा. इससे पारदर्शिता का लक्ष्य पूरा नहीं होगा. यहाँ आपत्ति वाली बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्यसभा में सांसद मोहम्मद नदीमुल ने सवाल पूछा कि क्या किसी ने इस कानून को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी. तब सदन में वित्त राज्यमंत्री ने कह दिया किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं कराई जब यह कानून पास हो गया. उसके बाद चुनाव आयोग ने कानून व न्याय मंत्रालय से कहा कि यह कानून पारदर्शी नहीं है. फिर से दो हजार उन्नीस के प्राइमटाइम का एक छोटा सा हिस्सा देखिए. इलेक्टरल बाँध के जरिए राजनीतिक दलों कि विदेशी शोर से अवैध चंदे को छिपाने में मदद मिलेगी. संदिग्ध चंदा देने वाला शॅल कंपनियाँ बंद कागजी यानी फर्जी और काला धन राजनीतिक दलों के खाते में जाकर कब जाएगा हो जाएगा. पैसे का सही स्रोत कभी सामने नहीं आएगा. आयोग चाहता था कि इलेक्टरल बाँट वापस ले लिया जाए.

सोचिए कानून मंत्रालय ने इन आपत्तियों को वित्त मंत्रालय के पास भेज दिया. वित्त मंत्रालय ने इसे अनदेखा किया. फिर भी अक्टूबर दो हजार अठारह के अंत तक चुनाव आयोग इलेक्टरल बौंड को वापस लेने की बात करता रहा. इसके लिए कई बार रिमाइंडर भी भेजा गया लेकिन वित्त मंत्रालय ने अनदेखा किया. इसके बाद भी वित्त राज्यमंत्री संसद में कहते हैं कि किसी ने आपत्ति नहीं की. जनवरी दो हजार उन्नीस में वित्त राज्यमंत्री को कहना पड़ गया कि एक गलती स्वीकार करनी पड़ रही है की आपत्तियां दर्ज कराई गई थी. फिर भी इस सवाल का जवाब नहीं मिला. सरकार ने उन आपत्तियों को दूर करने के लिए क्या क्या नितिन सेठी ने छह रिपोर्ट की एक सीरीज की थी. यही नहीं जिन दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने रिपोर्ट छापी उसे भी पब्लिक कर दिया ताकि देश की जनता और सरकारी एजेंसियां देख सकें कि अल ऍम अल बौंड का कानून किस तरह से लाया गया. नितिन सेठी की रिपोर्ट में दावा किया गया कि वित्त विधेयक छपने के बाद रिजर्व बैंक से सुझाव मांगा जाता है. अभी तक इलेक्टरल बॉन्ड के जरिए कई हजार करोड़ रुपए का चंदा राजनीतिक दलों के पास आया है. रिपोर्ट के अनुसार इस का बड़ा हिस्सा बीजेपी को मिल रहा है. सवाल है हजारों करोड़ रुपए का बाँड कौन खरीद रहा है. अगर उसकी कोई कंपनी है तो उस कंपनी के फायदे के लिए सरकार क्या क्या कर रही है. ये सब कैसे पता चलेगा? देखिए ऐसे ये पता लग सकता है. एक हजार रुपए के बाँड कितने बिके? एक करोड़ रुपए के बाँड कितने बिके सौ करोड़ रुपये के बाँड कितने बिके ये नहीं पता चल सकता. कम दाम या कम डिनोमिनेशन वाले बाँड किसने खरीदे और ज्यादा वाले किसने खरीदे लेकिन ये जरूर है के करीब नब्बे से पंचानबे प्रतिशत जो बाँड खरीदने जाते हैं वो सौ करोड या सौ करोड़ से ज्यादा के होते हैं.

एक हजार रुपये का बाँध तो शायद ही किसी ने एक प्रेस रिपोर्टर ने जरूर खरीदा था. शुरू शुरू में उसको चेक करने के लिए की उसपे नंबर गलत है कि नहीं, बाकी छोटे डिनोमिनेशन के बाँट बिल्कुल नहीं दिखते और बड़े डिनोमिनेशन के बाँट ज्यादा बिकते हैं उससे यही जाहिर होता है ये राजनीतिक दलों को बड़ी मात्रा में चिंता मिलता है और बड़ी मात्रा में जहाँ से चंदा मिलता है उनके बारे में तो फिर राजनीतिक दलों को वाकई में ध्यान देना पड़ता है क्योंकि यहाँ से पैसा आता है उस की तरह उसकी उसको खुश रखने की कोशिश की जाती है और उनके काम किए जाते हैं. मनरेगा में किसे मजदूरी मिलती है, सरकार उनका नाम, फोटो और बैंक का नाम सब वेब साइट पर डाल देती है, लेकिन सरकार बनाने के लिए चुनाव लड़ने के लिए राजनीतिक दल किससे चंदा ले रहे हैं. उनका नाम वेब साइट पर नहीं डाला जाता और आपने मान भी लिया कि बॉड से राजनीति में कालाधन समाप्त हो गया है. ये खबर इसी साल जून की है. कई जगहों पर छपी है मगर इसकी पडताल रिपोर्टर नहीं की है जिसके पत्रकार नितिन सेठी ने अल ऍम अल बाँड को लेकर एक साथ छह रिपोर्ट की थी. इस रिपोर्ट के अनुसार इलेक्टरल बॉड से केवल उन्नीस राजनीतिक दलों को ही बौंड मिला है. इसमें दो हजार सत्रह अठारह और दो हजार उन्नीस बीस के बीच जितने भी बाँट खरीदे गए प्रतिशत से ज्यादा का बाँड बीजेपी के पास गया. इस दौरान बासठ सौ करोड़ के बाँट खरीदे गए. क्या जनता को नहीं दिख रहा कि बाँध के जरिए एक ही राजनीतिक दल आर्थिक रूप से शक्तिशाली होता जा रहा है? क्या इससे राजनीति में असंतुलन और निरंकुशता पैदा नहीं हो सकती है? कनाडा में जो नियम कंपनी के लिए है वही व्यक्ति के लिए भी है. वहाँ आप चाहे व्यक्ति है या कंपनी सोलह सौ पच्चीस कनेडियन डॉलर से ज्यादा का चंदा नहीं दे सकते. यह कानून उन का एक मकसद यह भी है कि चुनावी राजनीति पर पैसे का प्रभाव कम हो. इसे आप एक और एंगल से समझ सकते हैं. अगर आप एक ही कंपनी से सैंकडों करोडों रुपए का चंदा ले ले तो सरकार में आकर उसी का काम करेंगे. एरपोर्ट से लेकर बंदरगाह से लेकर रेलवे की जमीन उसी कंपनी को मिलेगी. मूल बात है कि चुनाव में जितना ज्यादा पैसा आएगा, चुनाव कभी किसी भी मुक्त और निष्पक्ष नहीं हो सकता है. 

अब पूजा भारद्वाज की रिपोर्ट देखते हैं पुणे के एक किसान ने आत्महत्या कर ली है. मगर उसके पहले किसान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है. उन्हें जन्मदिन की बधाई दी है. महाराष्ट्र में किसान सबसे ज्यादा आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं. मगर उनको इस हताशा से बाहर निकालने के उपाय किसी को दिख नहीं रहे. महाराष्ट्र में बारिश से फसल बर्बादी की ऐसी तस्वीरें लगातार सामने आ रही है और इस से परेशान किसानों की आत्महत्या के मामले भी. महाराष्ट्र के पुणे जिले में एक बयालीस वर्षीय किसान ने फसल का उचित दाम नहीं मिलने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जन्मदिन की बधाई देकर खुदकुशी कर ली. पुणे जिले के जुन्नर तहसील के वडगांव आनंद गाँव में सत्रह सितंबर को दशरथ लक्ष्मण केदारी नाम की किसान ने ये चिट्ठी लिख कर मौत को गले लगा लिया. इनकी प्याज की खेती थी लेकिन फसल का संतोषजनक मूल्य नहीं मिलने से हताश थे. मरने से पहले केदारी ने लिखा था, हमारे पास पैसे नहीं है. साहूकार इंतजार करने को तैयार नहीं है. क्या करें हम प्याज को बाजार तक ले जाने का जोखिम भी नहीं उठा सकते. आप बस अपने बारे में सोच रहे हैं. मोदी साहब, आपको उत्पाद के लिए गारंटीकृत मूल्य प्रदान करना होगा. आप कृषि पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे हैं. किसानों को क्या करना चाहिए? फॅमिली धमकाते है और सहकारी समिति के अधिकारी गाली गलौज करते हैं. न्याय के लिए हम किसके पास जाए? आज मैं आपकी निष्क्रियता के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हूँ. कृपया हमें फसलों की कीमत दे जो हमारा अधिकार है. आपको जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं. मोदी साहब बीते सात सालों में तिरेपन हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है. किसानों की आय दुगनी करने का वादा था, लेकिन हर घंटे एक किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है. किसान विरोधी कानून लाने वाले मोदी सरकार ने खेती की लागत बढा दी और बजट का हिस्सा घटा दिया. कॉपी को केंद्र और राज्य सरकार को घेरने का मौका मिला.

पुणे के किसान केदारी जी ने कहा है मोदी जी है उनकी सरकार की विफलता है और ये कितनी बडी वो कि दो हजार बाईस में जब हम बात कर रहे हैं तो एक्चुअली तो किसानों की आय दोगुनी करने का दावा किया गया था. दोगुनी करना तो छोड़ दीजिए. आज हर घंटे एक से ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहा है. किसानों के खिलाफ तीन काले कानून लाने की कोशिश करी और उसके बाद मुंह की खानी पडी और कानून वापस लेने पड़े लेकिन कानून थोपे गए थे और उसके चलते किसानों की शहादत हुई. वहीं एनसीपी मुखिया शरद पवार ने शिंदे के हाल के कई गणेश पंडालों के दौरे पर तंग करते हुए कहा कि किसानों की आत्महत्या के बीच राज्य की सत्ता में बैठे लोग पहले प्राथमिकता तय करें कि क्या मनाना चाहिए. पुणे में किसान की आत्महत्या से मैं आहत हूं. राज्य में सत्ता में बैठे लोगों को जहाँ किसानों को आत्महत्या का सहारा लेना पडता है उन्हें ये तय करना चाहिए कि क्या मनाया जाए और किस की सराहना की जाए. राज्य में सत्ता में रहने वालो को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए. एनसीआरबी ने देश में आत्महत्याओं को लेकर अपनी ताजा रिपोर्ट में बताया था कि साल दो हजार इक्कीस में कृषि क्षेत्र से संबंधित दस हजार आठ सौ इक्यासी लोगों ने आत्महत्या की जिनमें से पाँच हजार तीन सौ अठारह किसान और पाँच हजार पाँच सौ तिरेसठ खेत मजदूर थे. रिपोर्ट के अनुसार कृषि क्षेत्र से जुडे सर्वाधिक संख्या में सैंतीस दशमलव तीन फीसदी लोगों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की.

महाराष्ट्र के किसान मुख्य तौर पर कृषि कर्ज के चलते आत्महत्या करते हैं. मुंबई से पूजा भारद्वाज एनडीटीवी इंडिया बंगाल में कथित रूप से शिक्षक घोटाले को लेकर ने चार्जशीट पेश कर दी है. इस चार्जशीट में दावा किया गया है कि बर्खास्त कर दिए गए शिक्षा मंत्री और तृणमूल कांग्रेस के नेता पार्थ चटर्जी और उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के पास से सौ करोड से अधिक की चल अचल संपत्ति बरामद हुई है. इसके एक दिन बाद ममता बनर्जी का बयान आता है कि जांच एजेंसियां प्रधानमंत्री के इशारे पर काम नहीं करती हैं क्योंकि सीबीआई अब पीएमओ को रिपोर्ट नहीं करती है. अब अगली खबर पर बढते हैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में फीस को लेकर तनाव बना हुआ है. यहाँ अलग अलग कोर्स की फीस सैंतीस सौ से लेकर इक्यावन सौ से अधिक कर दी गई है. हो सकता है आपको ज्यादा ना लगे लेकिन इससे दूसरे एंगल से देखिए. इस देश में मुश्किल से लोग पच्चीस हजार रुपया महीना कमा पाते हैं. जो पच्चीस हजार महीना कमा लेता है वो छोटी के दस प्रतिशत लोगों में आ जाता है. यही नहीं प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष विवेक देबरॉय का कहना है कि भारत एक निम्न मध्यमवर्गीय देश है. एक निम्न मध्यमवर्गीय देश में इक्यावन सौ की फीस बहुत ज्यादा है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के वीसी के दफ्तर की छत पर एक छात्र को फॅस सिलिंडर और गॅाड लेकर चढे देख हंगामा हो गया. वो आत्मदाह या आत्महत्या की धमकी देता रहा. बाद में उसे एक छात्र की मदद से पुलिस ने नीचे अच्छा प्रदर्शन इसकी हालत हो गई है. पिछले सिलिंडर लेकर वापिस मुँह कूदने जा रहा था मैंने अपनी जान पर खेल के. इसको पुलिस वालों के साथ जाकर मैं पहुँचा है. लेकिन पुलिस वाले में इसके साथ दुर्व्यवहार किया, मुँह उसके साथ दुर्व्यवहार किया. मारा पिटा गया उदयवार द्वारा छात्रों के साथ ही है. अपने आंदोलन के पन्द्रहवें दिन सैकडों की तादाद में इकट्ठा छात्रों ने मंगलवार को दफ्तर का घेराव किया. कुछ और छात्रों ने आत्मदाह की कोशिश की. पाल इससे इनकी झड़प भी हुई. कम से कम ठीक है और यहाँ हजारों की संख्या में छात्र ऍम अपने पे डालेंगे अगर हमारी मांग है चार सौ पच्चीस तीस वृद्धि के विरोध वापस भारी संख्या में मौजूद पुलिसबल को छात्रों पर काबू पाने में मशक्कत करनी पड़ी.

फाइव ब्रिगेड की गाडी से इन पर पानी की बौछार छोड़ी गई. किसी तरह पुलिस भरोसा दिलाने में कामयाब रही कि विश्वविद्यालय प्रशासन से उनकी बात कराई जाएगी. कल की तरह आज भी इनका जो छात्र है उनका प्रदर्शन जारी था तो उसी में कुछ छात्र उग्र हो गए थे जिसके लिए यहाँ पर फोर्स बुलवाई गई और उनको समझा जा के बात की गई और उनको बताया गया की संवाद के माध्यम से उनकी जो भी समस्या है वो आगे जो विश्वविद्यालय प्रशासन है उसको पहुचाये और इस तरह का उग्र जो किया गया वो ना करे, उग्र चीजें ना करे और यही बातचीत की जा रही है. पिछले पंद्रह दिनों से यह छात्र फीस वृद्धि को लेकर तरह तरह से प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन इन छात्रों से कोई बात नहीं कर रहा है. इस वृद्धि को लेकर छात्र और विश्वविद्यालय प्रशासन दोनों अपने मुँह है लेकिन ये मसला जिस से नहीं बल्कि आपसी समझ से हाल हो सकता है क्योंकि विश्वविद्यालय प्रशासन का प्राइवट इंस्टिटूट से फीस की तुलना करना कहीं से उचित नहीं है और छात्रों को भी ये समझना चाहिए कि अगर लंबे समय से फीस नहीं बढी है तो फिर उसने भी समझ कर तय करना चाहिए. इलाहाबाद से नितिन गुप्ता के साथ वाराणसी से अजय सिंह दिल्ली विश्वविद्यालय का भी ॅ लेट होने की तरफ बढता लग रहा है. जहाँ मध्य जुलाई के बाद पढाई होने लग जाती थी वहाँ दस अक्टूबर को नामांकन की पहली सूची आएगी उसके बाद ही आएगी. विश्वविद्यालय ने छात्रों से अपील की है कि ज्यादा से ज्यादा कॉलेज चुने लेकिन कई छात्र ऐसे भी हैं जिनका दाखिला एक छोटी सी गलती के कारण नहीं हो पा रहा है. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र सागर चौधरी यूईटी परीक्षा के रिजल्ट आने के बाद नए छात्रों के दाखिले में मदद करते हैं. इनके पास रोज सैकडों छात्र अपनी समस्या लेकर आते हैं. मंगलवार को सागर चौधरी इन छात्रों की समस्या दूर करने के लिए दिल्ली विश्वविद् विद्यालय के डीन से मिलने पहुंचे. इनका कहना है कि कई छात्रों ने तीन ही विषय की परीक्षा दी. चौथा छूट गया वो छात्र डीयू के दाखिले की रेस से बाहर हो गए हैं. के परीक्षा फॉर्म और रजिस्ट्रेश इनके ऑनलाइन फॉर्म भरने में हुई गलती ठीक नहीं हो पा रही हैं.

 ढाई सौ रुपए लेकर रजिस्ट्रेश इन सब का हो रहा है. बाद में उनको पता चलता है कि वो योग्य नहीं है. हाँ ऍम बन सकता है, फॅमिली दे सकता है क्योंकि पहली बार ऐसा हो रहा है अगर तू मिस्टेक ऍम करनी चाहिए और बच्चों के ट्विटर के साथ फ्लर्ट नहीं करना चाहिए. उन्हें एडमिशन अगर दिया जाए तो दे देना चाहिए. उधर पर सॅान्ग और नॉर्मल नंबरों को लेकर साइंस के छात्रों के तमाम सवाल हैं. साइंस विषय कीसी यूईटी परीक्षा देकर ह्यूमिनिटीज विषयों पर मुँह करने वाले छात्रों के नॉर्मल नंबर कम आने की शिकायत है. इस वजह से उनको मनपसंद कॉलेज मिलने में दिक्कत है. इस बाबत छात्रों की सवाल लेकर जब हम दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइॅन् सलर योगेश सिंह के पास पहुंचे तो उनकी सफाई दूसरी थी. अब आप क्या कर रहे हो कि पर्सेंटाइल भी साथ में देख रहे हो. फॅमिली एक दूसरी व्यवस्था है. नॉर्मल मुँह एक और अलग व्यवस्था है. ये बहुत बडी ऍम डीबेट है. इसमें कोई एक सलूशन निकलना किसी के लिए भी सरल नहीं है. अगर आप साइंस में एडमिशन लेना चाहते थे साइंस से तब तो आपको कोई डर था ही नहीं लेकिन जब आप स्ट्रीम चेंज करके उधर आ रहे हैं वहाँ पर जो स्टूडेंट्स है उनके साथ जब आप कम्पलीट कर रहे हैं तो यहाँ जो नॉर्मल मुँह आपने लिया है आपका वही लागू होगा. उसका फरदर नॉर्मल उं बोलते हैं वो तो हाँ सबल नहीं है. उसमें तो इस तरह के बच्चों को फिर नुकसान होगा तो उसका तो कोई अंत ही नहीं. इस चीज का वही जामिया विश्वविद्यालय और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय दाखिले के लिए अभी आने का इंतजार कर रहे हैं की प्रवेश परीक्षा का फॉर्म भरने से लेकर परिणाम आने के बाद में यूनिवर्सिटी का रजिस्ट्रेशन तक कराने में कई ऐसी छोटी छोटी गलतियां छात्रों ने की है जिसके वजह से या तो अब वो दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं या फिर उनका साल होने की नौबत आ गई है. पीएम को चाहिए कि ऐसे छात्रों की परेशानी को जानकर कोई ऐसा बीच का रास्ता निकाले जिससे उन का साल हो दिल्ली से हरकिशन शर्मा के साथ. रविशंकर शुक्ला ऍम इंडिया पुरानी पेंशन की बहाली को लेकर जिन लोगों ने लडाई लडी उनकी मेहनत साकार होती लग रही है । राजस्थान, छत्तीसगढ, झारखंड में पुरानी पेंशन बहाल हो गई है. पंजाब में भी मुख्यमंत्री मान ने घोषणा कर दी है. आज राहुल गाँधी ने ट्वीट कर दिया कि गुजरात में सरकार बन गई तो पुरानी पेंशन बहाल कर देंगे. आज ही अरविंद केजरीवाल ने गारंटी दी है कि गुजरात में पुरानी पेंशन बहाल कर दी जाएगी. उम्मीद है दिल्ली के सरकारी कर्मचारियों को भी पुरानी पेंशन मिलेगी और केंद्र सरकार के कर्मचारी भी एक दिन पुरानी पेंशन हासिल कर सकेंगे. पेंशन की लड़ाई वाजिब लड़ाई है. लड़ते रहिए, ब्रेक ले लीजिए. विडियो वायरल ना हो तो बहुत सारी सच्चाई का पता ना चले. कई बार लगता है की विडियो अपने आप में पत्रकार बन गया है. जो काम पत्रकारों को करना चाहिए वो वीडियो वाइरल हो कर कर दे रहा है. वरना आप जान ही नहीं पाते कि कबड्डी के खिलाडियों को शौचालय में खाना परोसा जा रहा था. ये घटना सहारनपुर की है और नहीं मैं ये स्तब्ध करने वाली तस्वीरें है. टॉयलेट के भीतर खाना रखने चार दिन पहले सहारनपुर में एक राज्य स्तरीय टूर्नामेंट के दौरान ये वाक्या हुआ. वीडियो में दिख रहा है कि लडकियाँ टॉयलेट के भीतर अलग अलग बर्तनों में रखे चावल और सब्जियाँ ले रही है. हाँ, इनके पास एक कागज के टुकडे पर छोडी हुई पूरियाँ दिखाई पड रही है.

इस एक मिनट के वीडियो में कैश होकर यूरिनल और वॉशबेसिन दिखाता है और फिर उसके दरवाजे के पास फर्श पर रखे चावल की प्लेट दिखाता है. खिलाडी खाना लेकर बाहर जाते देखे जा सकते हैं ऍम एक अन्य विडियो में कामगार बर्तन उठाकर उसे बाहर ले जाता है, जहाँ खाना पकाया जा रहा है. ये मामला सामने आने के बाद राज्य सरकार ने सहारनपुर स्पोर्ट्स ऑफिसर को निलंबित कर दिया है. उसने दावा किया था कि जगह की कमी से खाना चेंजिंग रूम में रखा गया था. नहीं नहीं ऍम में नहीं कराया जाता है ऐसा स्विमिंग पूल के अंदर खाने की बारिश हो रही है तो स्विमिंग पूल के अंदर खाने का किया गया और जो उनका खाना है तो स्विमिंग पूल का जो चेंजिंग रूम होता है उसके अंदर उसको खाने का सामान रखना क्योंकि वही एक जगह बैठ रही है. यहाँ पर निर्माणाधीन पूरे स्टेडियम चल रहा है. कई जगह नहीं. आप खुद भी देख सकते हैं तो वहाँ पे जा के खाने का व्यवस्था. हाँ, कबड्डी खिलाडियों के साथ इस तरह की बदसलूकी पर कई राजनीतिक दलों ने सवाल खडे किए हैं. कांग्रेस ने ट्वीट किया कि बीजेपी तरह तरह के प्रचार पर करोडों खर्च कर सकती है लेकिन खिलाडियों के लिए कायदे का इंतजाम नहीं कर सकती. ने ट्वीट किया, यूपी में कबड्डी खिलाडियों को टॉयलेट में खाना दिया गया. क्या बीजेपी इस तरह खिलाडियों का सम्मान करती है?

शर्मनाक ऍम डी अध्यक्ष जयंत सिंह ने इसे अपमानजनक बताया. किसी संबंध में जो भी अव्यवस्थाएं पाई पाई गई गई थी. इसमें एक जात मैंने भी एडी में पैर को दिया है और वो जो भी बिंदु है उन सभी बिंदुओं पर दो तीन दिन तीन दिन के भीतर जो है रिपोर्ट देंगे. रिपोर्ट के बाद इसमें जो है जो भी और आवश्यककार्रवाई रहेगी और शासन को जो भी जिस तरीके से अवगत कराना है वो हम लोग शासन को भी अवगत कराएंगे. इस कहानी की सबसे अजीबो गरीब बात शायद यह है कि सरकारी अफसर यह बहाना मार रहे हैं या ये एक्सक्यूस दे रहे हैं कि उनके पास और कोई जगह नहीं थी. कबड्डी के खिलाडियों को खाना सर्व करने के लिए टॉयलेट के अलावा सहारनपुर में अशोक कुमार और राजेश गुप्ता के साथ आलोक पांडेय एनडीटीवी इंडिया आप देख रहे थे प्राइमटाइम नमस्कार.

 



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